ग़ज़ल

क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़

کیوں کر اس بت سے رکھوں جان عزیز
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 3 shers· radif: अज़ीज़

यह ग़ज़ल एक गहन और चुनौतीपूर्ण प्रेम को दर्शाती है, जहाँ शायर अपनी जान और ईमान को महबूब, जिसे बुत से उपमा दी गई है, के मुकाबले कमतर मानता है। इसमें प्रेमी का वह भाव चित्रित है जहाँ वह महबूब के लगाए तीरों के दर्द को भी अज़ीज़ रखता है, और जान की कीमत जानते हुए भी कठिन भावनात्मक परिस्थितियों को सहता है। यह ग़ज़ल आंतरिक संघर्ष और ऐसे गहरे लगाव को परिभाषित करने वाली अदम्य भक्ति को व्यक्त करती है।

Source: rekhta · HI

गीत सुनें

शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
क्यूँकर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़ क्या नहीं है मुझे ईमान अज़ीज़
मैं उस प्रिय (बुत) से अपनी जान को क्यों अधिक प्रिय मानूँ? क्या मेरा ईमान भी मुझे उतना ही प्यारा नहीं है?
2
दिल से निकला पे न निकला दिल से है तिरे तीर का पैकान अज़ीज़
तीर का पैकान (नोक) दिल से निकल गया, पर दिल से गया नहीं, क्योंकि तुम्हारे तीर का पैकान बहुत प्यारा है।
3
ताब लाए ही बनेगी 'ग़ालिब' वाक़िआ सख़्त है और जान अज़ीज़
ग़ालिब, इस कठोर घटना को सहना ही पड़ेगा क्योंकि जान बहुत प्यारी है।
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