क्यूँ न वहशत-ए-ग़ालिब बाज-ख़्वाह-ए-तस्कीं हो — मिर्ज़ा ग़ालिब
क्यूँ न वहशत-ए-ग़ालिब बाज-ख़्वाह-ए-तस्कीं हो
कुश्ता-ए-तग़ाफ़ुल को ख़स्म-ए-ख़ूँ-बहा पाया
“Why should Ghalib's frenzy not reclaim its lost repose?For one by neglect slain, I found the foe demanding blood-money.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
क्यों न ग़ालिब की वहशत अपनी शांति वापस माँगे? क्योंकि मैंने पाया कि उपेक्षा से मारे गए व्यक्ति से ही शत्रु ख़ून-बहा माँग रहा था।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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