हूँ मुन्हरिफ़ न क्यूँ रह-ओ-रस्म-ए-सवाब से
टेढ़ा लगा है क़त क़लम-ए-सरनविश्त को
“Why should I not diverge from custom and righteous way?When fate's own pen has cut my destiny astray.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
मैं सही मार्ग और रीति-रिवाज़ से क्यों न भटकूँ? क्योंकि भाग्य की कलम ने ही मेरी तकदीर को टेढ़ा लिखा है।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
