ग़ज़ल
जो न नक़्द-ए-दाग़-ए-दिल की करे शोला पासबानी
جو نہ نقد داغ دل کی کرے شعلہ پاسبانی
यह ग़ज़ल दिल की तड़प और जज़्बात की आग को ज़िंदा रखने की अहमियत को बयां करती है, जिसके बिना ख़ामोशी और मायूसी इंसान को निगल जाती है। शायर ने इसमें महबूब की मुसलसल बेरुख़ी और ज़िंदगी भर की बे-तवज्जोही पर अपने गहरे रंज और उदासी का इज़हार किया है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
जो न नक़्द-ए-दाग़-ए-दिल की करे शोला पासबानी
तो फ़सुर्दगी निहाँ है ब-कमीन-ए-बे-ज़बानी
अगर शोला दिल के दाग़ रूपी धन की रखवाली न करे, तो ख़ामोशी की घात में उदासी और बुझापन छिपा बैठा है।
2
मुझे उस से क्या तवक़्क़ो ब-ज़माना-ए-जवानी
कभी कूदकी में जिस ने न सुनी मिरी कहानी
मुझे जवानी के दौर में उस से क्या उम्मीद हो सकती है, जिसने बचपन में भी कभी मेरी दास्तान नहीं सुनी थी।
3
यूँ ही दुख किसी को देना नहीं ख़ूब वर्ना कहता
कि मिरे अदू को या रब मिले मेरी ज़िंदगानी
बिना वजह किसी को दुख देना अच्छी बात नहीं है, वरना मैं खुदा से यही दुआ करता कि मेरे दुश्मन को भी मेरी जैसी ही ज़िंदगी मिले।
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