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कब तलक फेरे 'असद' लब-हा-ए-तफ़्ता पर ज़बाँ ताक़त-ए-लब तिश्नगी साक़ी-ए-कौसर नहीं

How long, Asad, shall I turn my tongue on parched lips?O Saki of Kausar, these lips can no longer bear this thirst!

मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

असद, मैं कब तक अपने सूखे होठों पर जुबान फेरता रहूँगा? ऐ कौसर के साकी, मेरे होंठ अब इस प्यास को सह नहीं सकते।

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

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