ग़ज़ल
हम रश्क को अपने भी गवारा नहीं करते
ہم رشک کو اپنے بھی گوارا نہیں کرتے
यह ग़ालिब की ग़ज़ल प्रेमी के गहरे स्वाभिमान को व्यक्त करती है, जहाँ वह अपनी ईर्ष्या को स्वीकार करने से भी इनकार करता है और प्रतिद्वंद्वी के साथ गुप्त संबंध रखने वाले महबूब की इच्छा करने के बजाय मृत्यु को चुनता है। यह उन पाखंडियों की भी आलोचना करती है जो उसे बुरा कहते हैं, साथ ही महबूब के होंठों की मोहक सुंदरता का बखान करती है जो शराब को रंग प्रदान करती है।
Source: rekhta · HI
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1
हम रश्क को अपने भी गवारा नहीं करते
मरते हैं वले उन की तमन्ना नहीं करते
हम अपनी ईर्ष्या को भी गवारा नहीं करते; हम मरते हैं लेकिन उनकी तमन्ना नहीं करते।
2
दर-पर्दा उन्हें ग़ैर से है रब्त-ए-निहानी
ज़ाहिर का ये पर्दा है कि पर्दा नहीं करते
छिपे तौर पर, उनका दूसरों से एक गुप्त संबंध है। उनका यह दिखावा कि वे कुछ नहीं छुपाते, असल में खुद एक पर्दा है।
3
ये बाइस-ए-नौमीदी-ए-अर्बाब-ए-हवस है
'ग़ालिब' को बुरा कहते हैं अच्छा नहीं करते
यह सांसारिक इच्छाओं में लीन लोगों के लिए निराशा का कारण है। वे 'ग़ालिब' को बुरा कहते हैं, पर खुद कोई अच्छा काम नहीं करते।
4
करे है बादा तिरे लब से कस्ब-ए-रंग-ए-फ़रोग़
ख़त-ए-पियाला सरासर निगाह-ए-गुल-चीं है
शराब तुम्हारे होंठों से अपनी चमकीली रंगत हासिल करती है। प्याले का किनारा पूरी तरह से फूल चुनने वाले की निगाह जैसा है।
5
कभी तो इस दिल-ए-शोरीदा की भी दाद मिले
कि एक 'उम्र से हसरत परस्त-ए-बालीं है
यह बेचैन दिल कभी तो अपनी सराहना या न्याय पाए। क्योंकि एक पूरी उम्र से, हसरत ही इसका निरंतर साथी रही है, हमेशा बिस्तर के पास रहने वाले सेवक की तरह।
6
ब-जा है गर न सुने नाला-हा-ए-बुलबुल-ए-ज़ार
कि गोश-ए-गुल नम-ए-शबनम से पमबा-आगीं है
यह उचित ही है यदि गुलाब व्याकुल बुलबुल की चीखें न सुने, क्योंकि गुलाब का कान ओस की नमी से रुई से भरा हुआ है।
7
'असद' है नज़्अ' में चल बे-वफ़ा बराए-ख़ुदा
मक़ाम-ए-तर्क-ए-हिजाब-ओ-विदा-ए-तम्कीं है
असद मौत की कगार पर है, हे बेवफ़ा, खुदा के वास्ते आओ। यह पर्दे त्यागने और गरिमा को विदा कहने का समय है।
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