“Ask not, Asad, of life's brief, promised span; even those two fleeting days were lived through doomsday's endless agony.”
ऐ असद, ज़िंदगी की इस कम मुद्दत के बारे में मत पूछ; जो दो दिन भी यहाँ काटे, वे क़यामत जैसी भयंकर मुसीबतों और तकलीफ़ों में गुज़रे।
हम अक्सर कहते हैं कि ज़िंदगी चार दिन की है और पलक झपकते ही बीत जाती है, लेकिन ग़ालिब इस बात को एक गहरे दर्द के साथ सामने रखते हैं। वो कहते हैं कि मुझसे ज़िंदगी के छोटे होने का ज़िक्र मत करो, क्योंकि वो दो दिन भी इतनी तकलीफ़ों और मुसीबतों में कटे हैं जैसे कोई क़यामत गुज़र गई हो। इस शेर का हुस्न इस तल्ख़ हक़ीक़त में है कि उम्र चाहे कितनी भी छोटी क्यों न हो, जब उसमें ग़मों का पहरा हो तो उसका एक-एक पल भी सदियों जितना भारी लगने लगता है।
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