ग़ज़ल
घर हमारा जो न रोते भी तो वीराँ होता
گھر ہمارا جو نہ روتے بھی تو ویراں ہوتا
यह ग़ज़ल अस्तित्व की गहन, अंतर्निहित वीरानगी में उतरती है, यह सुझाते हुए कि दुख एक अपरिहार्य अवस्था है। यह दिल की पीड़ा के विरोधाभासी स्वरूप की पड़ताल करती है, जहाँ उसकी कसक ही उसे अधिक गहन, कष्टदायक बेचैनी से बचाती है। शायर अंततः महबूब की अप्राप्य उपस्थिति की लालसा करता है, यह महसूस करते हुए कि जन्नत का दरबान भी उनके दरवाज़े तक पहुँचने की अत्यधिक कठिनाई को पहचानेगा।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
घर हमारा जो न रोते भी तो वीराँ होता
बहर गर बहर न होता तो बयाबाँ होता
हमारा घर न रोने पर भी वीरान ही रहता। यदि सागर सागर न होता, तो वह एक रेगिस्तान होता।
2
तंगी-ए-दिल का गिला क्या ये वो काफ़िर-दिल है
कि अगर तंग न होता तो परेशाँ होता
दिल की तंगी का क्या गिला करना? यह 'काफ़िर' दिल ऐसा है कि अगर यह तंग न होता, तो और भी ज़्यादा परेशान होता।
3
बाद यक-उम्र-ए-वरा' बार तो देता बारे
काश रिज़वाँ ही दर-ए-यार का दरबाँ होता
नेक जीवन बिताने के बाद, कम से कम एक बार तो दर्शन दे दो। काश रिज़वाँ ही मेरे प्रिय के द्वार का दरबान होता।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
