वाए! गर मेरा तिरा इंसाफ़ महशर में न हो
अब तलक तो ये तवक़्क़ो' है कि वाँ हो जाएगा
“Woe! Should our justice in the Day of Doom remain undone,Till now, this expectation holds, that it will there be won.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
हाय! अगर मेरा और तुम्हारा इंसाफ़ क़यामत के दिन भी न हो तो क्या होगा? अभी तक तो यह उम्मीद है कि वहाँ ज़रूर हो जाएगा।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
