कू यक शरर कि साज़-ए-चराग़ाँ करूँ 'असद'
बज़्म-ए-तरब है पर्दगए सोख़्तन हुनूज़
“O Asad, where is a single spark, to set the lamps alight?The festive gathering, even now, a burning curtain, shrouds its inner plight.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
हे असद, एक चिंगारी कहाँ है जिससे मैं दीये रोशन करूँ? आनंद की महफ़िल तो अभी भी जले हुए परदे में लिपटी हुई है।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
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