ज़ुल्फ़ से शब दरमियाँ दादन नहीं मुमकिन दरेग़
वर्ना सद-महशर ब-रेहन-ए-साफ़ी-ए-रुख़्सार है
“Alas, to place 'night' 'twixt the t tresses is not possible, Else a hundred Doomsdays stand as pledge for the cheek's pure light.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
अफ़सोस, ज़ुल्फ़ों के बीच रात को रखना संभव नहीं है। अन्यथा, गालों की शुद्ध चमक के लिए सौ क़यामतें गिरवी रखी जा सकती हैं।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
