ग़ज़ल
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
دلِ ناداں تجھے ہوا کیا ہے
यह ग़ज़ल मुहब्बत में दिल की बेबसी और महबूब की बेरुख़ी के दर्द को बयान करती है। शायर अपने दिल के दर्द और उसके इलाज पर हैरान है, उस बेचैनी को बयान करता है जहाँ एक तरफ़ बेपनाह चाहत है और दूसरी तरफ़ महबूब की पूरी बेपरवाही, और ख़ुदा से इस स्थिति की हक़ीक़त पूछता है।
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1
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
ऐ नादान दिल, तुम्हें क्या हो गया है? आखिर इस दर्द का इलाज क्या है?
2
हम हैं मुश्ताक़ और वो बे-ज़ार
या इलाही ये माजरा क्या है
हम इच्छुक हैं और वे नाराज़ हैं। हे ईश्वर, यह क्या मामला है?
3
मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ
काश पूछो कि मुद्दआ' क्या है
मेरे मुँह में भी ज़बान है, काश तुम पूछो कि मेरा अभिप्राय क्या है।
4
जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है
जब तेरे बिना कोई और मौजूद नहीं है, तो हे ईश्वर, यह सारा शोरगुल और हंगामा किस बात का है?
5
ये परी-चेहरा लोग कैसे हैं
ग़म्ज़ा ओ इश्वा ओ अदा क्या है
ये परी जैसे चेहरे वाले लोग कैसे होते हैं? उनके लुभाने वाले हाव-भाव, मोहक अंदाज़ और मनमोहक अदाएं क्या होती हैं?
6
शिकन-ए-ज़ुल्फ़-ए-अंबरीं क्यूँ है
निगह-ए-चश्म-ए-सुरमा सा क्या है
अंबर जैसी सुगंधित ज़ुल्फ़ों में शिकन क्यों है? सुरमे जैसी उन आँखों की निगाह क्या है?
7
सब्ज़ा ओ गुल कहाँ से आए हैं
अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है
घास और फूल कहाँ से आए हैं? बादल क्या चीज़ है और हवा क्या है?
8
हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
हम उन से वफ़ा की उम्मीद रखते हैं, जो यह नहीं जानते कि वफ़ा क्या होती है।
9
हाँ भला कर तिरा भला होगा
और दरवेश की सदा क्या है
हाँ, भला काम करो, तुम्हारा भला होगा। दरवेश की और क्या पुकार है?
10
जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है
मैं अपनी जान तुम पर न्योछावर करता हूँ। मुझे नहीं पता कि दुआ क्या होती है।
11
मैं ने माना कि कुछ नहीं 'ग़ालिब'
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है
मैं मानता हूँ कि 'ग़ालिब' कुछ भी नहीं हैं। लेकिन अगर वह मुफ्त में हाथ आ जाएँ, तो इसमें क्या बुराई है?
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