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'ग़ालिब' मिरे कलाम में क्यूँकर मज़ा हो पीता हूँ धोके ख़ुसरव-ए-शीरीं-सुख़न के पाँव

Ghalib, how could my verse not taste so sweet?I drink the washings from sweet-tongued Khusrav's feet.

मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

'ग़ालिब' कहते हैं कि मेरे कलाम में मज़ा क्यों न हो? मैं तो ख़ुसरव-ए-शीरीं-सुख़न (मीठी ज़बान वाले ख़ुसरव) के पाँवों के धोवन पीता हूँ।

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

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