“The lover's tears, a monsoon, one must behold,The garden wall, in a hundred places, like flowers unfolded.”
यह आशिक़ के आँसुओं की बरसात है, इसे देखना चाहिए। बगीचे की दीवार सौ जगह से फूल की तरह खिल गई है।
बर्शिकाल-ए-गिर्या-ए-आशिक़ है देखा चाहिए, खिल गई मानिंद-ए-गुल सौ जा से दीवार-ए-चमन। Barshikaal-e-girya-e-aashiq hai dekha chahiye, Khil gayi maanind-e-gul sau ja se deewar-e-chaman. एक प्रेमी के रोने की जो बरसात है, उसे देखना चाहिए। उसके असर से बाग की दीवार सौ जगहों से फूल की तरह खिल गई है। 'बर्शिकाल' का अर्थ है वर्षा ऋतु या मानसून, 'गिर्या' का मतलब है रोना, और 'मानिंद-ए-गुल' का मतलब है फूल की तरह। मेरे दोस्त, कल्पना कीजिए कि किसी का दुख इतना गहरा हो कि उसके आंसू एक पूरा मौसम बन जाएं। ग़ालिब यहाँ कह रहे हैं कि उनके रोने की नमी से बाग की दीवार में दरारें आ गई हैं। लेकिन वह इसे दीवार का टूटना नहीं कह रहे, बल्कि कह रहे हैं कि दीवार फूलों की तरह खिल उठी है। यह उस घड़ी की बात है जब आपका दर्द इतना बढ़ जाता है कि वह आपके आसपास की बेरंग चीज़ों को भी एक नया रूप दे देता है। टूटना भी कभी-कभी सजना बन जाता है। जब हम अंदर से टूटते हैं, तो अक्सर बाहर की दुनिया को भी अलग नज़र से देखने लगते हैं। ग़ालिब की नज़र में वह दीवार सिर्फ गिर नहीं रही, बल्कि वह उनके प्यार की नमी को सोखकर जीवित हो उठी है। यह वैसा ही है जैसे किसी पत्थर पर पानी गिरते रहने से उस पर सुंदर निशान बन जाते हैं। या जैसे कहा जाता है कि दरारें ही वह जगह हैं जहाँ से रोशनी अंदर आती है। हमारी तकलीफ भी कभी-कभी हमें एक नई खूबसूरती से मिला देती है।
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