बहुत सही ग़म-ए-गीती शराब कम क्या है ग़ुलाम-ए-साक़ी-ए-कौसर हूँ मुझ को ग़म क्या है

“Granted, the world is rife with grief, but is there any lack of wine? / I serve the Cupbearer of Kausar—what sorrow could be mine?”

— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

माना कि दुनिया के ग़म बहुत हैं, लेकिन शराब भी तो कम नहीं है। मैं साक़ी-ए-कौसर का ग़ुलाम हूँ, तो फिर मुझे किस बात का ग़म हो सकता है?

विस्तार

शायर यहाँ दुनिया के दुखों को कबूल करते हुए भी बड़ी बेफिक्री से मुस्कुरा देता है, मानो कह रहा हो कि ग़म कितने भी हों, उन्हें भुलाने के लिए पैमाने कम नहीं पड़े हैं। मगर दूसरे मिसरे में यह सांसारिक शराब अचानक एक गहरे रूहानी रंग में ढल जाती है, जहाँ वह खुद को 'साक़ी-ए-कौसर' (हज़रत अली) का अकीदतमंद बताता है। जब किसी का नाता जन्नत के जाम छलकाने वाले से जुड़ा हो, तो भला दुनिया की छोटी-मोटी तकलीफें उसका क्या बिगाड़ सकती हैं!

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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