“Now they swear an oath to attend my funeral, O Ghalib / Those who once would always swear upon my very life.”
ऐ ग़ालिब, जो लोग पहले हमेशा मेरी ज़िंदगी की क़सम खाया करते थे, अब वे मेरे जनाज़े में शरीक होने की क़सम खा रहे हैं।
ग़ालिब यहाँ 'क़सम खाने' के मुहावरे के ज़रिए मोहब्बत की एक बड़ी कड़वी और दिलचस्प सच्चाई बयां कर रहे हैं। जिस महबूब के लिए कभी उनकी ज़िंदगी इतनी अज़ीज़ थी कि वह बात-बात पर उनकी जान की क़सम खाता था, वही अब उनके जनाज़े पर आने का वादा कर रहा है। इस शेर में एक गहरा दर्द भी है और एक हल्की-सी तंज़िया मुस्कान भी, जो दिखाती है कि वक्त के साथ रिश्ते और वादे कैसे अपना रुख़ बदल लेते हैं।
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