“This essence, rare even for gods to find,Its sweetness delights the heart and mind.The blessed enjoy this bliss, the fortunate souls,Not attained by ascetics, nor those seeking distant goals.”
यह रंगरस देवताओं के लिए भी दुर्लभ है; यह मन को मीठा लगता है। इस रंगरस का आनंद केवल भाग्यशाली व्यक्ति ही लेते हैं, योगी या विरक्त लोग इसे प्राप्त नहीं करते।
यह दोहा 'रंगरस' की बात करता है, जो जीवन के आनंद और उल्लास का सार है। इसमें कहा गया है कि यह गहरा सुख और मिठास देवताओं के लिए भी दुर्लभ है, और यह मन को बहुत प्रिय लगता है। दोहा बताता है कि केवल वे भाग्यशाली लोग ही 'रंगरस' का अनुभव कर पाते हैं जो जीवन के अनुभवों को पूरी तरह से अपनाते और उनका आनंद लेते हैं। इसका अर्थ यह भी है कि जो लोग सांसारिक सुखों का त्याग करते हैं, जैसे योगी या संन्यासी, या वे जो जीवन से विरक्त और अलग रहते हैं, वे इस अद्वितीय आनंद को प्राप्त नहीं कर सकते। यह जीवन में पूरी तरह से शामिल होकर सच्ची संतुष्टि पाने के महत्व पर जोर देता है।
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