પલક ટકે નહિ પેટમાં, જા ખાય બિલાડી ખીર; ખામુંખાં શિદ ખવરાવિએ, તે વિચારોને મારા વીર. સજ્જનo

“No moment stays within its belly, like kheer devoured by a cat;Why should we then needlessly feed it? My dear friend, just ponder that.”

— दलपतराम
अर्थ

यदि पेट में एक पल भी कुछ न टिके, जैसे बिल्ली खीर खा जाए, तो उसे व्यर्थ ही क्यों खिलाएँ? मेरे मित्र, ज़रा इस पर विचार करें।

विस्तार

यह दोहा हमें एक आम अनुभव की याद दिलाता है: किसी ऐसी चीज़ में प्रयास करना जिसका कोई स्थायी परिणाम न हो, ठीक वैसे ही जैसे एक बिल्ली स्वादिष्ट खीर चट कर जाती है। खीर पलक झपकते ही खत्म हो जाती है, जिससे कोई वास्तविक या स्थायी प्रभाव या सराहना नहीं बचती। कवि पूछता है, 'बेवजह क्यों खिलाएं?' यह हमें सोचने के लिए प्रेरित करता है कि हम अपना समय, ऊर्जा और दयालुता कहाँ निवेश करते हैं। क्या हम उन्हें दे रहे हैं जो वास्तव में इसकी कद्र करते हैं और इससे लाभान्वित होते हैं, या हम अपनी कीमती संसाधनों को किसी ऐसे व्यक्ति या चीज़ पर बर्बाद कर रहे हैं जो कोई स्थायी प्रतिफल नहीं देगा? यह हमें अपनी उदारता के प्रति सचेत और बुद्धिमान बनने के लिए प्रोत्साहित करता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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पाठ
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