“Glory to Allah, who created thee (O Holy Prophet!) in the most beautiful, the best, and the most perfect mould. Who is (the humble) Meher Ali to chant thy praises; How (presumptuous and) impudent his eyes are to aspire to the heights of thy love!”
यह पंक्तियाँ कहते हैं कि अल्लाह की शान है कि उन्होंने आपको (ऐ पैगंबर!) सबसे खूबसूरत, सर्वश्रेष्ठ और सबसे उत्तम रूप में बनाया। मैंहर अली कौन है जो आपके गुणगान करें; मेरी आँखें आपके प्रेम की ऊँचाइयों की कामना करने में कितनी निडर हैं।
यह ग़ज़ल शुद्ध भक्ति का एक अद्भुत भाव है। बुल्ले शाह यहाँ दिव्य प्रेम की पूर्णता का गुणगान करते हैं, और नबी (सल्ल.) की रचना को सबसे उत्तम और आदर्श रूप में बताते हैं। इसके बाद, शायर अपनी विनम्रता दर्शाते हुए सवाल करते हैं कि मैंहर अली जैसे साधारण मन का क्या हक़ है कि वह ऐसे गुणगान करे या उस दिव्य प्रेम की गहराई की कामना करे। यह विनम्रता और प्रेम का एक सुंदर पाठ है।
