“That which transcends aversion, that is Ghazal.And that which culminates in love, that is Ghazal.”
जो घृणा से ऊपर उठ जाए, वह ग़ज़ल है। और जो प्रेम में बदल जाए, वह ग़ज़ल है।
यह शेर, अमृत घायल साहब ने, कला की रूह को छूता है। ये कहते हैं कि ग़ज़ल का सफर बहुत गहरा होता है। सबसे पहले, ग़ज़ल को हमें अपनी अरुचि से ऊपर उठना पड़ता है... किसी चीज़ से बेगाना महसूस करना छोड़ना पड़ता है। और फिर, जब वह ग़ज़ल प्रेम के सागर में गोते लगाती है, जब वह हमें इश्क़ की मिठास से परिणत करती है, तभी वह अपनी असली पहचान पाती है! यह शायरी का सबसे ऊँचा मक़ाम है।
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