“Such is the tale of the desire-free,O Akha, the other is the woe of filling the belly.”
इच्छा-रहित व्यक्ति की गाथा ऐसी है, अखा, बाकी सब तो केवल पेट भरने की व्यथा है।
अखा भगत की यह पंक्ति जीवन के दो अलग-अलग पहलुओं को समझाती है। एक है 'निस्पृही' यानी निस्पृह व्यक्ति की कथा, जिसकी कोई सांसारिक इच्छाएं नहीं होतीं। ऐसे व्यक्ति का जीवन शांति और मुक्ति का प्रतीक है। दूसरा पहलू, अखा कहते हैं, पेट भरने की व्यथा है। यह केवल भोजन की बात नहीं, बल्कि सांसारिक वस्तुओं और इच्छाओं के पीछे भागने की निरंतर चिंता और परेशानी है। अखा हमें याद दिलाते हैं कि इच्छाओं से मुक्त होकर ही हम सच्ची शांति पा सकते हैं, जबकि भौतिक सुखों के पीछे भागना केवल संघर्ष और दुख लाता है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि असली सुख कहाँ है।
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