शायरों की कहानियाँ · 10:21
जौन एलिया: उर्दू के जीनियस
Urdu ke Genius
Jaun Elia
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जौन एलिया आधुनिक उर्दू शायरी के सबसे प्रभावशाली शायरों में गिने जाते हैं। 1931 में अमरोहा के एक विद्वान परिवार में जन्मे जौन बचपन से ही प्रतिभाशाली थे और आठ वर्ष की उम्र में शायरी लिखना शुरू कर दिया था। उनकी शिक्षा और परिवेश ने उनके विचारों को गहराई और विविधता दी, जिसमें इस्लामी इतिहास, सूफी परंपरा, दर्शन और तर्कशास्त्र का मिश्रण था। जौन ने अपनी पहली किताब 'शायद' 60 वर्ष की उम्र में प्रकाशित की, जो उनके जीवन के संघर्ष और अधूरेपन को दर्शाती है। उनकी शायरी में विद्रोह, वर्ग चेतना और आदर्श की तलाश प्रमुख विषय रहे। वे न केवल शायर बल्कि महान अनुवादक भी थे, जिन्होंने कई क्लासिकल ग्रंथों का अनुवाद किया। जौन एलिया की रचनाएँ आज भी युवाओं और संगीतकारों को प्रेरित करती हैं। उन्हें प्राइड ऑफ परफॉर्मेंस जैसे सम्मान भी मिले और उनकी याद में डाक टिकट भी जारी हुआ।
- ◆जौन एलिया बचपन से ही प्रतिभाशाली और आधुनिक उर्दू शायरी के अग्रणी शायर थे।
- ◆उन्होंने गहरी पारंपरिक शिक्षा को क्रांतिकारी विचारों से जोड़ा।
- ◆उनका व्यक्तिगत जीवन संघर्ष, प्रकाशन में देरी और दार्शनिक खोजों से भरा था।
- ◆उन्होंने कई क्लासिकल ग्रंथों का अनुवाद किया।
- ◆उनकी शायरी आज भी युवाओं और संगीत में प्रभावशाली है।
- ◆उन्हें प्राइड ऑफ परफॉर्मेंस सम्मान और डाक टिकट से नवाजा गया।
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क्या एक अजीम शायर होने के लिए अंदर से पूरी तरह टूटा हुआ होना जरूरी है।
आज की इस चर्चा में हम एक ऐसे ही शक्स के सफर पर निकलेंगे जिनोंने आधुनिक उर्दू शायरी को एक बिल्कुल नया और थोड़ा बाघी रूप दिया।
हम बात कर रहे हैं सयद हुसेन सबते असखर नकवी की। दर असल पूरी दुनिया इन्हें एक ही नाम से जानती है। जॉन एलिया।
ये कहानी सिर्फ चंद घजलों की नहीं है। ये एक ऐसे इंसान की कहानी है जिसके भीतर एक अलग ही तूफान हमेशा चलता रहता था।
लेकिन उनकी एक बेहत करीबी दोस्त थे कमर राजी। उनना एक कथन शुरुवाद से ही इस जटिल्ता को थोड़ा आसान कर देता है।
कमर राजी कहा करते थे कि जॉन आलोचना करने में यानि क्रिटिसाइज करने में कभी पीछे नहीं हरते थे। लेकिन साथ ही वो एक सच्चे दोस्त भी थे। पर सबसे दिल्चास बात जो नोंने कही वो ये थी कि जॉन अपने ही ख्यालों में गुम एक भटके हुए मु�
कितना बड़ा रहा होगा। इसका अन्दाजा सिर्फ एक ही बात से लगाये जा सकता है। मश्वूर शायर मजरू सुल्टानपूरी
ने उन्हें शायरों का शायर यानि दे पोएट व पोएट्स कहा था। और हम सब जानते हैं कि मजरू सुल्टानपूरी
हुद कितने बड़े फनकार थे। उनके जरिये जॉन एलिया को ये दरजा देना अपने आप में इस बात पर पक्की मोहर लगाता है कि साऊथ एजिन लिटरिचर में जॉन की जगा कितनी उंची और बिल्कुल बेदाग थे। उनका काम आम लोगों से लेकर बड़े-बड
पर उनकी जड़े क्लासिकल ट्रेडिशन में बेहब गहरी थी। उन्होंने मदरसा में तालीम हासिल की, इसलामिक इतिहास को घोट कर पिया और सूफी परमपरा को बहुत करीब से जाना। वहीं दूसरी तरफ उन्होंने मॉडर्न राडिकलिजम को पूरी शिद्धत से ग
तू आखेर इन विचारधराओं की शुरुवात कहां से हुई। दरसल, इसकी जड़े उनके बच्पन और उनके परिवार में छुपी थी।
1931 में ब्रितिश इंडिया के अमरोहा में जन्में जौन एलिया एक बेहत पढ़े लिखे शिया परिवार से आधे थे। जरा उनके आलेमाना महुल पर गौर कीजे। उनके वालिद अल्लामा शफीख हसन एलिया लिटरिचर और अस्ट्रोनमी के बड़े विद्वान थे�
रोही उनके चचेरे भाई थे। जौन खुद एक चाइल्ड प्रॉडजी थे। जब कोई बच्चा इन दिग्गच बुद्धी जीवियों के बीच पला बड़ा हो, तो जाहिर है उसके जहन पर इसका असर जिन्दगी भर रहना ही था।
भरत की पहिये के साथ उनकी जिंदगी के सफर पर नज़र डालना बेहत जरूरी है। जैसा कि हमने देखा, 1931 में उनका जन्म हुआ और सिर्फ 8 साल की कमसिन उम्र में, 1949 में ही उनोंने शायरी लिखना शुरू कर दिया था। लेकिन जिंदगी की राहें कहां इतनी सीधी ह
शादी जाहिदा हिना से हुई। लेकिन इस पूरे टाइम लाइन में, जो सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात है, वो है 1991 का साल, जब आखिर कर उनकी पहली किताब प्रकाशित हुई। और उसके कुछ साल बाद, 2002 में, वो हमेशा के लिए इस दुनिया से रुकसत हो ग�
जाएँ नहीं। उनके अध्यान का दाइरा सोचे कितना विशाल था। फिलोसिफी, लोजिक, इसलामिक हिस्ट्री और यहां तक की कबाला जैसे मुश्किल विश्चों का उनोंने बहुत गहरा अध्यान किया था।
इन्ही अलग-अलग प्राचीन विचारधाराओंने उने एक एसी क्षमता दी, जिससे वो अपनी शाईरी में पुराने दर्शन और नए विचारों का एक बैठतरीन तालमेल बिठा पाए। हमने बेले जिकरे किया था कि वो नाहिलिस्ट और आनाकिस् थे। लेकिन जौन
से आनाकी पसंचायर थे जिनकी गजलों में बगावत और क्लास कॉंशिस्निस की आग बिल्कुल साफ़ चलकती थी।
उनका सीधा समानना था कि जब तक इस पुराने खोखले समाजिक धाँचे को तोड़ा नहीं जाएगा, तब तक कोई नया, बैठतर धाँचा बन ही नहीं सकता।
राचनीती और दर्शन की इस गेहरी दुनिया से थोड़ा आगे बढ़ें, तो उनकी नीजी जिंदगी में भी काफी उतलपुतल देखने को मिलती है।
उनकी मुलाकाथ मशुरू लेखिका जाहिडा हिना से हुई थी, जब वो दोनों इन्शा नाम की एक उर्दू मैगजीन के लिए काम कर रहे थे। ये दोस्ती धीरे धीरे प्यार में बढ़ली, और 1970 में दोनों ने शादी कर ली। उनके तीन बच्चे भी हुए, जिर्य
देखिक सफर के सबसे बड़े रहस्य पर आते हैं। सोचने वाली बात है, एक ऐसा चायल्ड प्रॉडजे, जिसने सिर्फ आठ साल की उमर में ही बहतरीन शायरी करनी शुरू कर दी थी, उसने अपनी पहली किताब प्रकाशिट करने के लिए साथ साल की उमर तक का इंतजा
तार दबाव के बाद ही उनका पहला मज्मूआ यानी पहली किताब शायद दुनिया के सामने आ सकी। और जब एक बार उनकी किताबे आनी शुरू हुई, तो शायद, यानी, लेकिन, गुमान, गोया, फर्णूद और रमूस जैसे बेमिसाल संग्रः दुनिया के सामने आ
गए गहरे सवाल थे। जड़ा इन किताबों के नामों पर घौर कीजे। हर नाम, किसी ना
किसी अधूरेपन या किसी संदीह की तरफ इशारा करता है, जोकी उनकी फिलिसोफिकल सोच
को बिल्कुल सटीक ढंग से बयान करता है। लेकिन धेर ये, जौन एलिया का दाइरा सिर्फ शायरी तक ही सीमत नहीं था। वो गध्य यानी प्रोज के
भी उतने ही बड़े फनकार और अनुवादक थे। ये शायद कम ही लोग जानते हैं कि उन्होंने सद्यों पुराने सूफी, मुताजली और इस्माईली ग्रंथों का बेहत खुपसूर्थी से अनुवाद किया। इन महत्वपूर्ण कामों में मसीही बगदाद हलाज, त�
ये सफर और भी दर्दनाख हो गया। शायर पीरजादा कासिम ने इन आखरी बरसों की ट्राज़िडी को बहुती गहराई से बयान किया है। उन्होंने कहा कि जॉन पूरी जिंदगी एक आदर्श, एक आइडिल की तलाश में भटकते रहे और जब वो आदर्श उन्हें �
एसे दार्शने की कहाणी थी जो सिर्फ काम्याबी नहीं बल्कि सचाई
की तलाश में खुद अपनी ही वजूट से लड़ता रहा। पर ऐसी
शख्सियते मौत के साथ कहाँ ख़त्म होती हैं। आज की नई जन्डरेशन
के लिए उनका असर खासकर मौडन संगीत के जरिये बिल्कुल साफ देखा जा सकता है।
आज के दोर के रापर्स और म्यूजिशन्स उनकी शायरी को अपने संगीत में पिरो रहे हैं।
चाहे वो 2020 में के कैप का गाना बुलावा हो, जो पैनाई का मकान से प्रेरित है,
बैंड निश्टर पाक का पुराने और नए सवाल हो, या फिर 2023 में तलहा अंजम का राप,
सीकरेट्स, जो उनकी लाइन बेदली क्या यूही दिन गुजर जाएंगे से जुड़ा है।
ये सभी रचनाएं साबिद करती हैं कि उनकी बाघी सोच और उनका अकेले पन,
आज के नौजवानों को बिल्कुल अपनी ही दिल की आवाज लगती है।
सरकार और समाज ने भी उनकी इस बेमिसाल साहित्यक योगदान को कदर की निगास से देखा।
साल 2000, उनकी जिंदगी में इस लिहास से बहुत खास रहा,
क्योंकि लिटरिचर में उनके असाधारन योगदान के लिए,
पाकिस्तान के राश्ट्रिपती द्वारा उने प्राइड ओफ पुर्फॉर्मेंस अवार्ड से नवाज आ गया।
और उनके गुजरने के बाद, साल 2013 में, उनकी अजीम याद में एक कमेमरेटिव पोस्टिड स्टैम भी जारी किया गया,
जो मेन अफ लेटर सीरीज का एक गौरफशाली हिस्सा था। तो, इस पूरे रोमांचक और गहरे सफर के बाद, एक बहुत ही बड़ा दार्शनिक सवाल हमारे सामने आकर ख़ड़ा होता है।
जॉन एलिया का अपना मानना था कि खुद को सच में बनाने के लिए पहले खुद को तोड़ना पड़ता है। तो, सवाल ये है, क्या वाकई में एक सची साहित्यक श्रीष्ठता, एक ट्रू लिटरी जीनियस बनने के लिए इनसान को खुद को इस हद तक तोड़ना ज़र
पर मजबूर जरूर कर देता है कि क्या महानता की कीमत हमेशा अकेलेपन से ही चुकाई जाती है।
